क्या तमाशा देखने के लिए ही पैदा हुआ हैं?

आईएनएन भारत डेस्क:
नई दिल्ली। आज परीक्षा देने के उपरांत भोजन की तलाश में निकला ढूंढते ढूंढते एक चौराहे के ढाबे पर पहुचा।खाना खाते समय मन घिन आ रहा था।मतलब बता नहीं सकता कि निवाला लेते समय क्या क्या महसूस हो रहा था? 30रुपया में भर पेट खाना था।थोड़ा सा ही में मन भर गया।खाने के पश्चात जब चलने के लिए खड़ा हुआ तो मेरे विपरीत सड़क किनारे एक व्यक्ति नजर आया।थोड़ा पलक झपका की अचानक से गायब हो गया। मैंने सोचा यार ये बन्दा गया कहा।तभी एक व्यक्ति की आवाज आई कि कोई नाले में गिर गया।मैं भी भाग कर आया। देखा तो वो निकालो निकालो की पुकार लगा रहा था।लेकिन लोग निकालने के बजाय उसे गलियाने और तमाशा देखने में लगे थे। आस पास के रिक्शा वालों को मैं और एक लड़का गुहार लगा रहे थे कि यार कहि से रस्सी लाओं इसे निकाला जाय।सबका जबाब था जाने दो कौन फँसेगा ? हम दोनों सामने के पुलिस चौकी पर गए वो भी बंद पड़ा था,अचानक मैं पीछे मुड़ा तो देखा वो मुसाफिर गायब था।मैं भी डर गया सोचा मैं भी अपना अगला पेपर देने चलू।मगर दिल गवारा नहीं किया।तभी मेरी नजर एक सैनिक पर पडी  मैंने उसे अनुरोध किया। वो भाग कर रस्सी लेकर आया और उसी समय भगवान का दिया हुआ वरदान वहां एक बन्दे के रूप में प्रकट हुआ।एक दिल्ली पुलिस का सिपाही भी आ पहुचा। लोगों की भीड़ अच्छी खासी थी, लेकिन देखने वालों की।काफ़ी मशक्त के बाद उसे बाहर निकाला गया।बेचारे की जान बच गई।कुछ कोट पैंट व सूटबूट वाले सज्जन भी खड़े होकर तमाशा देख रहे थे। काफी देर से हमे भागते हुए देख रहे थे।बाद में पता चला कि वो चलाकी कर रहे थे कि हम किसी पचड़े में ना पड़े। आज समझा कि एक भीड़ किसी की कैसे हत्या कर देती हैं, सड़क के किनारे कैसे किसी की मृत्यु हो जाती है और लाश को सिर्फ़ कचरा समझ कर लोग नाक और आँख बंद कर निकल जाते है।ये सोच कर की मेरा क्या लगता है ? आप एक बार सोचे कि अगर आपको ये दिन देखने पड़े तो आप क्या करेंगे??भगवान न करे किसी के साथ ऐसा हो, फिर भी।आज हम अपने स्वार्थी जीवन में इतने व्यस्त हैं कि हमारे सामने किसी की जान की कोई मोल नहीं है।भगवान ने हमें मनुष्य बनाया, सोचने समझने की सलाहियत दी, दुख सुख से रूबरू कराया। अगर आपके वजह से किसी की जान बच जाती है तो इसे बड़ा धर्म क्या हो सकता है? हम और आप ने ही वो समाज बनाया है जिसमे बेगुनाह और बेजुबान को मुजरिम बना देते है। कोई किसी की मदद करे तो कभी उसका नुकसान भी उसे उठाना पड़ता है।ये सब हमारे आपके स्वार्थ के कारण होता है। ऐसा कुछ नहीं है। अगर हम एक दूसरे का सहयोगी बन जाये दुख दर्द बांटने वाला बन जाये तो ये दूरिया भी कम हो जाएगा। इन्ही हाथों से इन्सान कभी जिंदा आदमी को गिराने के लिए उठाता है, तो कभी एक मुर्दे को उठाने के लिए।मेरा नम्र निवेदन है कि इन हाथों का प्रयोग किसी को उठाने के लिए करे। भगवान ये मौका अगर आपको देता है तो शायद वो यह समझता है कि यह मेरा बनाया हुआ मूरत है।जिसको मैंने अपने हाथों से मनुष्य बनाया है। जो चेतनशील है। बस एक 23 साल का छोरा भला क्या कह सकता है ? जो हमेशा भावनाओं से जूझता रहता हैं।
सच्ची घटना, लेखक:- मोहम्मद प्रफुल.