फासीवाद से मुकाबले का माकपाई सच 

आइएनएन भारत डेस्क:
अब जब देश आजादी के बाद के सबसे जटिल समय से गुजर रहा है तो परंपरागत वाम विशेषकर वाम खेमे की सबसे बड़ी पार्टी माकपा के अंदरूनी संघर्ष को देखकर लगता ही नही है कि उसे फासीवाद से संघर्ष में कोई दिलचस्पी है अथवा वह गंभीरता से उसके एजेंडे में है। माकपा के आंतरिक द्वंद्व को देखकर लगता है कि 2018 में पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन की तरफ बढ़ती इस पार्टी की सारी चिंन्ता महासचिव की गद्दी के चारों ही सीमित होकर रह गयी है।
हाल ही में माकपा में 2019 के आम चुनावों और कांग्रेस के साथ जाने को लेकर एक बहस चल रही है। पार्टी महासचिव सीताराम येचूरी को जहां कांग्रेस से गठजोड़ का प्रबल समर्थक माना जाता है तो वहीं प्रकाश करात इसके मुखर विरोधी हैं। अब इसी गठजोड़ के सवाल पर माकपा में जबरदस्त खेमे बंदी हो रही है। एक तरफ जहां माकपा की सहयोगी भाकपा ने अपनी लाइन में बुनियादी परिवर्तन करते हुए मौजूदा समय में एक जनवादी, धर्मनिरपेक्ष और वाम गठजोड़ की बात की है तो माकपा ऐसे वाम, जनवादी और धर्मनिरपेक्ष गठजोड़ की बात करता है जो कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बनाकर रहेगा। शायद यह तथाकथित तीसरे मोर्चे की माकपाई खुमारी है जो अभी तक भी प्रकाश के दिमाग पर हावी है। बेशक इस तीसरे मोर्चे ने कुछ किया हो कि नही मगर हाशिये पर पड़े जनसंघ को और बाद में भाजपा को देश की प्रमुख पार्टी बनने का मौका तो दिया ही है। बावजूद उसके प्रकाश करात अपनी उसी पुरानी लाइन को पार्टी पर से थोपना चाहते हैं। जाहिर यह महज पार्टी को दो खेमे में बांटकर अपने मनपंसद और किसी चहेते को गद्दी सौंपने के अलावा कुछ भी नही है।
दरअसल, खेमेबंदी के लिए एक वामपंथी पार्टी के नेता क्या कर सकते हैं यह माकपा के मौजूदा आंतरिक संघर्ष से जाहिर होता है। 2004 में यूपीए के साथ जाने और कांग्रेस से गठजोड़ का माकपा का निर्णय का आधार नवंबर 2003 की केन्द्रीय कमेटी का एक फैसला बना था। अपने उस फैसले में माकपा ने आंध्र प्रदेश में भाजपा-टीडीपी गठजोड़ को हराने के लिए कांग्रेस के साथ जाना तय किया था। परंतु अब यदि माकपा की वेबसाइट पर जायें तो आपको पार्टी के सभी दस्तावेज वहां उपलब्ध हैं। परंतु नवंबर 2003 का वही एक दस्तावेज आप माकपा की वेबसाइट पर नही देख सकते हैं। 30 सितंबर 2003 के बाद सीधा 30 जनवरी 2004 का दस्तावेज वेबसाइट पर है। अब सवाल यह उठता है कि वेबसाइट और सोशल मीड़िया का इंचार्ज कौन है और पार्टी की अंदरूनी उठापटक का इस एक दस्तावेज से क्या लेना देना है। वेबसाइट और सोशल मीड़िया की इंचार्ज और कोई नही पोलित ब्यूरो सदस्य वृंदा करात हैं। अब इस तरह की गलती का होना स्वाभाविक है जिससे कि पब्लिक डोमेन से और पार्टी कैडर की निगाह से ऐसे दस्तावेजों को दूर ही रखा जाये। ऐसा भी नही है कि पार्टी में इसे लेकर कोई चर्चा नही हुई है। ‘‘स्क्राॅल डाट इन‘‘ नामक एक वेबपोर्टल की अपनी एक स्टोरी में इस दस्तावेज के गायब रहने को पहले रेखांकित कर चुका है और उसमें माकपा महासचिव और पूर्व महासचिव प्रकाश करात के करीबी किसी पोलित ब्यूरो सदस्य के हवाले से इसे एक भूल भी बताया गया है। उसके बाद भी लगता है कि माकपा की पोलित ब्यूरो की एक लाॅबी इस दस्तावेज को अपने कैडर और बाकि वामपंथी बुद्धिजीवियों की पहंुच से दूर रखना चाहती है। असल में, माकपा की भीतरी बहस के तर्कों पर यहां चर्चा करना जरूरी है।
– प्रकाश लाॅबी का तर्क है कि कांग्रेस के साथ गठजोड़ के कारण ही वामपंथ कमजोर हुआ है। परंतु शायद वह भूल जाते हैं कि 2004 में कांग्रेस के साथ गठजोड़ के बाद वाममोर्चा पहली बार संसद में साठ के आंकड़े को पार कर पाया था।
– प्रकाश खेमे को यह भी बताना चाहिए कि 2009 में यूपीए के खिलाफ खड़े होने के कारण ही वाममोर्चा आज की कमजोर स्थिति में है।
– यूपीए एक में वाममोर्चे के दखल के कारण आरटीआई, मनरेगा जैसे प्रगतिशील काम किये जा सके थे।
– माकपा के प्रकाश करात खेमे को हिंदी पट्टी में भाजपा की जीत का विश्लेषण करना चाहिए कि भाजपा केवल वोट बंटवारे के आधार पर ही आज केन्द्र और यूपी में सत्तासीन है और यदि दिल्ली नगर निगम चुनावों को ही लें तो आप और कांग्रेस के वोट के कुल योग के सामने भाजपा कहीं ठहरती नही है।
– यूपी में भी कांग्रेस, सपा और बसपा के कुल वोटों से भाजपा काफी पीछे है। तो तथाकथित तीसरे मोर्चे की कवायद क्या भाजपा को 2019 में भी सत्ता में रखने का खेल नही होगा।
वास्तव में इस सारी कवायद में फासीवाद से लड़ाई कम और अपने मनपंसद महासचिव को बनाने की चाह ज्यादा है। ऐसा नही है कि प्रकाश करात इस वास्तविकता को नही समझते होंगे कि कांग्रेस के बगैर 2019 का समर जीत पाना मुश्किल ही नही असंभव है। परंतु यदि कांग्रेस के साथ जाने की मजबूरी पर मोहर लगाते हैं तो इसका अर्थ है कि वो सीताराम येचूरी की समझदारी के साथ खड़े होंगे और ऐसे में सीताराम का पद पर बने रहना पक्का हो जायेगा। अब ऐसे में एक दस्तावेज को वेबसाईट से गायब करके केवल बहस को कमजोर किया जा रहा है और अपने कैडर को एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की पहंुच से अलग किया जा रहा है। यह उस वामपंथी नेतृत्व का काम है जो उच्च मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि से आता है और दक्षिणी दिल्ली की पाॅश कालोनी में रहता है। वैसे काफी समय पहले अटल बिहारी सरकार बनने के बाद दिल्ली के गांधी शान्ति प्रतिष्ठान में कामरेड विनोद मिश्र की पुण्यतिथि पर आयोजित एक गोष्ठी में बोलते हुए माकपा नेता प्रकाश करात ने कहा था कि देश में फासीवाद जैसा कोई खतरा नही है। हालांकि उनके कथन का मजबूत प्रतिवाद उसी समय वहां पर मौजूद फारवर्ड ब्लाॅक के सचिव जी देवराजन ने अपने जोशीले भाषण में किया था। परंतु लगता है कि माकपा पूर्व महासचिव के लिए देश में अभी भी खतरा फासीवाद नही उनके पार्टी महासचिव सीताराम येचूरी ही हैं या कहें कि देश और फासीवादी खतरे से बड़ी उनकी व्यक्तिगत आकांक्षाएं और टोलेबाजी ही है।