सोनिया गांधी से सबक लें समाजवादी ओल्ड गार्ड्स

फ्रैंक हुज़ूर :
जितनी आसानी से, बिना किसी आतंरिक गतिरोध के और हल्ले हंगामे के, कांग्रेस पार्टी में पुरानी पीढ़ी से नयी पीढ़ी के हाथों में सर्वोच्च अधिकार और कमान का ट्रांसफर हुआ है, ये भारतीय परिदृश्य में एक सबक है और एक अच्छा उदहारण है!

सोनिया गाँधी इस ‘स्मूथ ट्रांसफर’ के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेद्दार है और इसीलिए मेरी नज़र में बधाई की हक़दार है!

गाँधी परिवार भारत का सबसे पुराना, 132 वर्ष पुरानी, राजनीतिक डायनेस्टी है! इसलिए ये ‘चेंज ऑफ़ गार्ड’ ज्यादा प्रासांगिक है! सभी के लिए। राजनीति के साथ साथ समाज के हर परिवार के लिए जहाँ दो पीढ़ियों के बीच एक न एक दिन सब कुछ ट्रांसफर हो जाना है।

यहाँ मुझे पिछले साल के उत्तर प्रदेश में चल रहे भारत के सबसे बड़े दल, समाजवादी पार्टी के अंदर सत्ता और अधिकारों के ट्रांसफर पर याद आ रहा है कि समाजवादी पार्टी के ओल्ड गार्ड्स ने अखिलेश यादव को मजबूत और सफल बनाने की जगह कमज़ोर करने के लिए क्या क्या नहीं किया?

समाजवादी वेटेरन लीडर्स को सोनिया गाँधी से सीखने की जरुरत है। उन्होंने अगर साल २०१६ के उत्तरार्ध में अखिलेश की लीडरशिप में भरोशा दिखाया होता, पूरे दमखम से साथ दिया होता, बिना हड़बोंग और बहकावे के पार्टी की कमान उनके हाथों में सौप दी होती तब वो ऐतिहासिक मौका नहीं खोते उत्तर प्रदेश के इतिहास में पहली बार सरकार रिपीट करने में।

अखिलेश ने सारी ताकत, मेहनत और लगन समाजवादी सरकार को जिताने के लिए लगा रखी थी, मगर वहीं जिन्हे मार्गदर्शन और समर्थन के साथ कंधे से कंधे मिला के चलना चाहिए था उन्होंने युवा समाजवादी तुर्क की लोकप्रियता के साथ कदमताल करने से अपने को खींच लिया पीछे की तरफ और उसी के साथ भारत के सबसे बड़े राज्य में भगवा सरकार की ताजपोशी हो गयी।

आज सोनिया गाँधी ने राहुल गाँधी को नरेंद्र मोदी के सामने एक भावी प्रधानमंत्री के रूप में खड़ा कर दिया है। मोदी सरकार ने जितनी तेज़ी से अपनी लोकप्रियता खोयी है उतनी तेज़ी से मनमोहन सिंह जैसे गैर राजनीतिक नेतृत्व ने भी यूपीए पहले दौर में भी नहीं खोयी थी?

आज मोदी के धर्मांद समर्थक भी खिसकने लगें है और राहुल के पिछले तीन महीने के गुजरात कैंपेन की सराहना कर रहे है। ईवीएम मशीन का खेल जो भी हो, मोदी सरकार स्थायी नहीं रह सकती अब क्योंकि जनमानस का सब्र फटने लगा है, प्रेशर बिल्ड होने लगा है और ढेर सारे राजनीतिक दल राहुल गाँधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस अम्ब्रेला के नीचे आने के लिए अपने को तैयार करना शुरू कर चुके है।

समाजवादी पार्टी के ‘डिसिडेंट लीडर्स’ को आत्ममंथन करना चाहिए और जितना जल्द हो अखिलेश की क़यादत को मजबूती प्रदान करनी चाहिए। क्योंकि उत्तर प्रदेश दिल है भारत का और आगामी लोक सभा चुनाव में बीजेपी आरएसएस के उम्मीदवारों के लिए जितना बहुत मुश्किल है।

वापसी करने के लिए समाजवादी पार्टी के पास सुनहरा मौका है, उससे कांग्रेस पार्टी को केंद्र में मजबूती मिलेगी और २०१९ में अखिलेश यादव केंद्र सरकार में एक महत्वपूर्ण चेहरा बनकर उभर सकतें है।

खोई साख हासिल करने के लिए अब वक़्त आ गया है। सभी को साथ आना होगा।