गुजरात चुनाव भारतीय राजनीति में पीढ़ीगत बदलावों की आहट

गुजरात चुनावों का परिणाम और राहुल गांधी का कांग्रेस की कमान संभालना देश की राजनीति में दोनों घटनाएं लगभग एकसाथ ही घटी हैं और दोनों ही देश के भविष्य पर असर डालने वाली राष्ट्रीय राजनीति की महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। गुजरात का चुनाव और उसमें कांग्रेस का एक विकल्प के रूप में उभार इस मायने में अर्थपूर्ण और महत्व की घटना है कि यह भाजपा और उसके मातृ संगठन संघ के दक्षिणपंथी हिंदुत्व के एजेंड़े की प्रयोगशाला है।

गुजरात को भाजपा और संघ एक माॅडल के रूप में देश दुनिया के सामने के इसलिए पेश नही करते हैं कि वह विकास का कोई अनूठा और बेजोड़ नमूना है। गुजरात संघी राजनीति के लिए इसलिए माॅडल है कि कैसे अल्पसंख्यक समुदाय को नियन्त्रित समुदाय के रूप में रखते हुए बहुसंख्यक समुदाय के तथाकथित गौरव अथवा सामाजिक अहम को सुतंष्ट करके लूट के कारपोरेट एजेंडे को आगे बढ़ाया जाता है। और इसमें भी कारपोरेट समर्थित दक्षिणपंथी राजनीति की सबसे शातिर चाल यह है कि वह अपने इस खेल में सबसे चालाकी से उस वंचित तबके का इस्तेमाल करके जीतती है जो इस कारपोरेट विकास के सबसे पीड़ित हैं, या कहें कि इसके सबसे बड़े शिकार हैं। यदि हम 2002 के सांप्रदायिक दंगो पर और उसमें शामिल चरित्रों पर नजर ड़ाले तो भारतीय इतिहास के उस सबसे कलंकित मंजर के अधिकतर उपकरण दलित, पिछड़े और आदिवासी ही मिलेंगे। इस चुनाव में भी मणिशंकर अय्यर के एक शब्द को पकड़कर मोदी ने फिर से उन्हीं तबकों का शिकार कर लिया उनका वोट हासिल कर लिया। यही भारत के इस ब्राहमणवाद की शातिर मानसिकता का अनूठा उदाहरण है कि समाज के कमजोर तबकों के लिए जिस संबोधन, जिस अपशब्द को उसने गढ़ा है वह उसका इस्तेमाल भी अपनी जीत के लिए कर लेता है।

बहरहाल, बात गुजरात चुनावों की करें तो कांग्रेस के लिए उसकी हार में भी जीत है और भाजपा के लिए साफ इशारा है कि उसके जाने के दिन अब शुरू हो चुके हैं। इस जीत के बाद मोदी और जेटली ने जिस प्रकार इस जीत को कारपोरेट विकास के आर्थिक सुधारों से जोड़ा है और उन्हें तेजी से आगे बढ़ाने का उद्घोष किया है उससे तय है कि यह सुधार की तेजी ही उनके ताबूत में आखिरी कील बनेगी। परंतु कांग्रेस के लिए भी यह सबक की तरह है कि इस देश में आर्थिक सुधारों की शुरूआत करने वाली पार्टी को भी अब इन सुधारों पर पुनर्विचार करना होगा।

बेशक कांग्रेस के वापसी को राहुल की कड़ी मेहनत और उनकी सहनशीलता से जोड़कर कांग्रेस की उपलब्धि को राहुल के नाम लिखा जा रहा है। परंतु गुजरात में कांग्रेस की यह वापसी हार्दिक, जिग्नेश और अल्पेश ठाकोर की तिकड़ी के बिना संभव नही थी। कांग्रेस और समूचे विपक्ष को समझ लेना चाहिए कि संघ-भाजपा के शासन को जमीन पर कोई स्थापित विपक्ष नही बल्कि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के छात्र नौजवान चुनौती दे रहे हैं। देश के स्थापित विपक्ष से इतर वंचित समाज के शिक्षित नौजवान और नवयुवतियां अलग अलग राज्यों और विशेषकर हिंदी पट्टी में अपने अपने स्तर पर विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं। यह भारतीय राजनीति के नेतृत्व में एक तरह का पीढ़ीगत और सामाजिक बदलाव है, भारतीय राजनीति में नई पीढ़ी की दस्तक है। गुजरात में राहुल गांधी ने इस पीढ़ीगत बदलाव को अपनी राजनीति के साथ जोड़ने का प्रयास किया। राहुल गांधी का यह प्रयास ही भाजपा के ‘‘टीना‘‘ फेक्टर अर्थात कोई विकल्प नही के जुमले को तोड़ने में कामयाब रहा है। राहुल गांधी और उनके सहयोगी जनवादी, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील दल अब आगे बढ़कर हिंदी पट्टी में उभरते इन क्षेत्रिय नायकों और उभरते नये सितारों को साथ जोड़कर उपयुक्त मंच उपलब्ध कराते हैं तभी देश की राजनीति में एक नये विकल्प को तैयार किया जा सकता है। निसंदेह गुजरात चुनावों के नतीजों ने देश की राजनीति में ‘‘कोई विकल्प नही‘‘ के भाजपाई जुमले को पीट दिया है, बेशक इन नतीजों से नये विकल्प की राह प्रशस्त हुई है। परंतु इस नई राह की कुछ शर्तें हैं और इसकी शर्तों में नये पीढ़ीगत बदलाव और इस उभरती हुई नई पीढ़ी के सवालों को समाहित करना और साथ ही उनके सवालों के समाधान देकर आगे बढ़ना है।