सामाजिक न्याय ही देश की एकता का असली सूत्र

भारत में अल्पसंख्यक समाज का भविष्य इस बात पर निर्भर है कि देश में लोकतान्त्रिक शक्तियाँ कितनी मज़बूत हैं। दुर्भाग्य से पिछले वर्षो में लोकतान्त्रिक शक्तियाँ लगातार कमजोर हुई हैं जिसके कारण आज बहुसंख्यको और अल्पसंख्यक समाज के बीच हिंसा और अविश्वास का रिश्ता बन गया है। निश्चित रूप से यह रिश्ता उस समय तक मित्रता , बराबरी और सहयोग का रिश्ता नहीं बनेगा। जब तक देश में सही मायनो में लोकतंत्र स्थापित नहीं होगा। बहुत ही गंभीर वातावरण के दौर से गुजर रहा है यह पूरा देश। लगातार लोकतान्त्रिक वयवस्था को कमजोर करने की साजिश चल रही है! विभिन्नता में एकता वाला समाज और देश में, एक राष्ट-एक भाषा वाले विचार रखनेवाले लोगो के हाथ में देश सुरक्षित नहीं रह सकता। १९४७ में बटवारे के साथ मिली आज़ादी, जहाँ मजहब के नाम पर दर्दनाक रक्तपात हुआ था। मुस्लिम सामाज से आनेवाले लोग जो इधर रुक गए उनके लिए बहुत कठिन चुनौती थी। बहुत असमंजस की स्थिति थी।
मौलाना अबुल कलम आज़ाद ने १९४७ में दिल्ली की जामा मस्जिद के मंच से तकरीर करते हुए मुसलमान भाइयो से कहा था,” मैं आपको कभी राय नहीं दूंगा की आप सरकार से विश्विसनीयता के प्रमाण पत्र की आकांक्षा करे, मैं आपको यह सलाह देता हूँ कि संयुक्त भारतीय जीवन के लिए किये गए अपने योगदानो को याद करे। आपको इस विरासत को अपनाना चाहिए क्योंकि इसपर आपकी छाप भी है। इसीलिए जब तक आप खुद बाहर निकलना न चाहे कोई आपके साथ ऐसा करने की हिम्मत नहीं कर सकता। हम यह कसम खाये की यह हमारा देश है और हम इसकी भलाई के लिए है। भारत का भाग्य मुसलमानो की हिस्सेदारी के बगैर अधूरा रहेगा”। बहुत ही मार्मिक तकरीर थी। उन्होंने सामाजिक सौहार्द के लिए बहुत महत्वपूर्ण कार्य किये।बंटवारे के बाद सबसे बड़ी घटना बाबरी मस्जिद विध्वंस की रही, जो भारतीय लोकतंत्र पर एक काला धब्बा था। जिसनें लोगो के दिल बांट दिए। फिर गुजरात दंगा जहाँ भारत की वैश्विक स्तर पर साख गिरी। धर्मनिरपेक्षता पर प्रश्नचिन्ह लग गया।
आज फिर धार्मिक उन्माद जैसा माहौल तैयार किया जा रहा है। देश को पीछे ले जाया जा रहा है। जहाँ, एक तरफ लाखो करोड़ो युवा बेरोजगार सड़क पर है, वही दूसरे तरफ भावनात्मक धार्मिक मुद्दों को उछालकर उन बेरोजगार युवाओ का ध्यान भटकाया जा रहा है। गुजरात के खोखले झूठे विकास को पैमाना बनाकर लोकसभा का चुनाव लड़ा गया। जिस तरह से आज़ादी के दौरान मौलाना अबुल कलम आज़ाद ने सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ और सामाजिक सौहार्द के लिए महत्वपूर्ण कार्य किये। ठीक उसी तरह बिहार में लालू यादव ने ९० के बाद वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ फिरकापरस्त ताकतों से मुकाबला किया। पिछले २०१४ के लोकसभा चुनाव के दौरान लालू यादव जी अपनी चुनावी सभाओ में बार बार साम्प्रदायिक शक्तियों के खिलाफ आम जनमानस को आगाह करते थे। लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान जमुई में एक सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था , “हम जो खतरा देख रहे है, हम जो लक्षण देख रहे है। सभी जाति के लिए, भारत के लिए ठीक नहीं है। बड़े खतरनाक हालत पैदा किया जाने वाले है। इस दंगल में तय होने वाला है कि भारत टूटेगा या भारत रहेगा, यह तय हमको करना है।४७ के हालात पैदा होने वाले है। देश को आज़ादी मिलने के बाद पाकिस्तान बन गया, नया हिन्दुस्तान अलग हुआ। कहीं भाई छूट गया , कहीं माँ छूट गयी, कहीं परिवार छूट गया। उस दंश को देश ने झेला है। वही हालत पैदा करने वाली है बीजेपी, ये संघ परिवार, नरेंद्र मोदी। इस देश में बीस करोड़ मुसलमान भाई, सिख, ईसाई और हिन्दू भाई है। यही भारत की खूबसूरती है। अलग-अलग त्यौहार है। हम सब मनाते है। लेकिन इस देश को बार बार हिन्दुत्व का नारा देकर गद्दी पर बैठना चाहते है। पहले भी आपने देखा होगा। लालू कोई नया नहीं है मैं पुराना हूँ। मुझे आपने ताकत दे थी। ९० में जो ताकत दी थी, लालू के राज के पहले दंगा, दंगा, दंगा चारो तरफ दंगे होते थे, लेकिन आपने जब, हमको बनाया मुख्यमंत्री , गाय भैस बकरी चराने वाले के बेटे को बनाया तो हमने यही कसम खाई थी। पिछड़े वर्गो के लोगो, गरीब लोगो शेड्यूल कास्ट और शेड्यूल ट्राईब को बाबा साहब ने संविधान में अधिकार दिया था लेकिन भारत का पिछड़ा वर्ग मंडल कमीशन हम लोगो ने लागू करवाया था। और उसी मंडल कमीशन के खिलाफ नरेंद्र मोदी के नेता लालकृष्ण आडवाणी कमंडल रथ लेकर निकले थे। नौजवानो याद रखो भूल मत जाना नहीं तो पछताओगे। हमने कसम खाई थी राज रहे या न रहे। लालू के राज में कोई दंगा करेगा। कुर्सी को लात मार दूंगा, लेकिन दंगाई की छाती को मैं तोड़ डालूगा और हमने किया, यही मेरा कसूर है। इसीलिए मुझे फंसाया गया। जेल भेजा गया। लेकिन मैं झुकूंगा नहीं”। साम्प्रदायिक शक्तियाँ, आज अगर किसी से भी डरती है तो वो लालू यादव है। साम्प्रदयिक शक्तियों से लोकतंत्र और संविधान बचाने के लिए, फिर एक मंडल जैसे आंदोलन की जरूरत है। किसान मज़दूर छात्र नौजवानो को इस मुहिम में आगे आना चाहिए।

(अमित कुमार, शोध छात्र जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली)