बदजुबानी और आरोप प्रत्यारोप की नई राजनीति

गुजरात चुनावों में जिस तरह की गिरावट और बयानबाजी देश ने देखी है वह तमाम संसदीय गरिमा और संसदीय लोकतंत्र के उच्च पदों की गरिमा को पूरी तरह से तार तार कर देने वाली है। इस राजनीतिक मूल्यों की गिरावट का सबसे अधिक चिंताजनक पहलू यह है कि इस हद दर्जे की गिरावट को और किसी ने नही बल्कि देश प्रधानमंत्री ने सबसे अधिक हवा दी है। यह कोई पहला अवसर नही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस प्रकार की बयानबाजी की हो। इससे पहले अपना ऐसा रंग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई बार दिखा भी चुके हैं और उसे दोहरा भी चुके हैं।

वास्तव में एक व्यक्ति पर कोई संस्थानिक, सांगठिनक और किसी प्रकार का नैतिक अंकुश नही रहता है तो वह लगातार इस प्रकार के व्यवहार को दोहराए जाने से कोई गुरेज भी नही करता है। ठीक यही हाल देश के प्रधानमंत्री मोदी का है। उनकी बयानबाजी में ना केवल व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप है, बल्कि जातिय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के तमाम हथकंड़े हैं। वो उत्तर प्रदेश में जब श्मशान और कब्रिस्तान की बात करते हैं तो जाहिर है कि वह दो संप्रदायों की आस्थाओं और उनके धार्मिक कर्मकाण्ड़ों के आधार पर किसी मनगढ़ंत भेदभाव का इशारा देकर सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं। ठीक यही काम वह जातिय सामाजिक ध्रुवीकरण के लिए भी करते हैं। जिसके लिए वह कभी स्वयं को सार्वजनिक रूप से पिछड़ा घोषित करते हैं तो कभी नीच कहे जाने पर उसे अपनी जातिगत पहचान से जोड़कर बवाल खड़ा करते हैं। ठीक यही बात वह देश के कुछ शीर्ष नेताओं के कुछ पाकिस्तानी राजनयिकों से व्यक्तिगत मुलाकात को पाकिस्तान से सांठगांठ के रूप में पेश करके करते हैं। इसके अलावा मणिशंकर अय्यर जैसे वरिष्ठ नेता की पाकिस्तान यात्रा को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस प्रकार से उनकी सुपारी देने की यात्रा के रूप में पेश करते हैं, वह भारतीय राजनीति में इस जारी वाद विवाद को एकदम से बाजारू जुमलेबाजी के स्तर पर ले जाते हैं। इस तरह के आरोप किसी सड़कछाप, गली और नुक्कड़ की स्तरहीन बहसबाजी देखे जाने के प्रमाण गली नुक्कड़ की स्तरहीन बहसों के अलावा आपको कहीं मिलेंगे नहीं। कम से कम राष्ट्रीय राजनीति के वाद विवादों में तो नहीं। परंतु यह प्रधानसेवक नरेन्द्र मोदी और उनकी राजनीति के लिए स्वाभाविक हैं और एकदम अनिवार्य भी।

वास्तव में भाजपाई नायक और मौजूदा दौर में देश के प्रधानमंत्री के लिए ही नही दुनिया के किसी भी दक्षिणपंथी नेता की यही भाषा और राजनीतिक विमर्श का तरीका और सलीका हो सकता है। इसमें कुछ भी हैरानी की बात नहीं है। हां, भारतीय संदर्भ में यह भारतीय समाज की विविधताओं के कारण थोड़ा ज्यादा वीभत्स हो जाता है। अभी तक हम भारतीय समाज की विविधताओं पर इतराते हुए इसे विविधता में एकता का अनूठ नमूना बताते हुए अघाते नही थे। परंतु जब यह विविधताएं टूटती हैं और इन विविधताओं को तोड़कर सत्ता शीर्ष पर पहंुचने वाला व्यक्ति हाशिये पर पड़े नफरत वालों और इन विविधता विरोधियों का महानायक बन जता है तो उस समाज के लिए यह विविधताएं एक बड़ा संकट भी बन जाती हैं। विविधता में एकता की खुबसूरती समाज को चुभने लगती है और अभी तक की खुबसूरती समाजिक बदसूरती में बदल जाती है। और यह केवल भारतीय समाज अथवा विकासशील दुनिया के साथ नही हो रहा है बल्कि खुबसूरती के बदसूरती बन जाने की साक्षी आज पूरी दुनिया हो रही है। एकध्रुवीय दुनिया की महाशक्ति अमेरिका से लेकर विकसित दुनिया के पश्चिमी यूरोपीय देश भी इस खतरे को झेल रहे हैं। यदि बात विविधताओं की करें तो संभवतः अमेरिका के न्यूयार्क शहर को दुनिया में विविधताओं की राजधानी माना जाना चाहिए। जहां दुनिया के लगभग 199 देशों के लोग बसते हैं। दुनिया के लगभग सभी देशों में इस उन्मादी दक्षिणपंथ का उभार साफ देखा जा सकता है। सवाल यह है कि यह उभार इतना व्यापक और इतना निर्णायक क्यों हैं और क्यों दुनिया के राजनीतिक विमर्श पर यह दक्षिणपंथी उन्माद पिछले तीन से भी ज्यादा दशकों से अपनी पकड़ बना और बढ़ा रहा है।

दरअसल यह आवारा वित्त पूँजी का तिलिस्म और उसकी मुनाफे की हवश ही है जो आज पूरी दुनिया को उन्माद की भाषा बोलना सीखा रहा है और कहें कि सीखा चुका है। अस्सी के दशक में रोनाल्ड़ रेगन और मार्गरेट थैचर के उदय से शुरू हुआ तथाकथित आर्थिक सुधारों के दौर ने जो विषमताएं दुनिया में पैदा की हैं उसने ना केवल दुनिया की राजनीतिक भाषा को बदलकर रख दिया है बल्कि पूरी दुनिया को एक दक्षिणपंथी भयावह खतरे के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया है। दुनिया के तमाम अर्थशास्त्री और वित्त विशेषज्ञ बेशक इस दौर के आर्थिक संकटों को पिछली सदी के तीस के दशक से अलग करके देखें और हिटलर के मौजूद संस्करणों को भी अलग तरह से समझने का प्रयास करें परंतु यह तय है कि दुनिया के यह सभी उन्मादी जुमलेबाज आर्थिक विषमताओं और गैर उत्पादक पूँजीवाद की पैदाइश ही हैं। उन्माद की वतर्मान राजनीति का उभरना आवारा वित्त पूँजी के बने रहने की एक आवश्यक शर्त की तरह है। यदि दुनियाभर में उभर रहा यह दक्षिणपंथी उन्माद नही होगा तो ना केवल राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय वित्त पूँजी का वर्चस्व समाप्त हो जायेगा बल्कि आवारा वित्त पूँजी और उसके अस्तित्व को बनाये रखने वाले तमाम मौजूदा संस्थानिक उपकरणों और उसकी सभी नीतियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा। अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए ही दुनियाभर में यह आवारा वित्त पूँजी दक्षिणपंथी राजनीति को ना केवल हवा देती हैं वरन उसके वित्तीय और वैचारिक पोषण भी करती है। असल में, वित्त पूँजी द्वारा निर्मित विकास की भूमंडलीय अवधारणा ही दुनिया में नये संकट की जड़ है। अपने मुनाफे की भूख के लिए अन्तार्राष्ट्रीय वित्त पूँजी ने जो तथाकथित विकास का विनाशक नव उदारवादी माॅडल तैयार किया है वह अब पूरी दुनिया के प्रगतिशील तबकों और शान्ति पसंद लोगों के लिए ही नही बल्कि सभी के लिए एक चुनौती बन गया है।

विकास की मौजूदा भूमंडलीय अवधारणा के केन्द्र से नागरिक अथवा समाज निकलकर वित्त पूँजी से कमाया जाने वाला मुनाफ काबिज हो चुका है। और अपने मुनाफे के लिए वित्त पूँजी ना केवल सरकारी नीतियों और अर्थप्रणाल के पुराने स्वरूप को बदलती है बल्कि यह अर्थशास्त्र के स्थापित नियमों को भी पूरी तरह बदल डालती है। अर्थशास्त्र का मांग और पूर्ति का स्थापित नियम समाज की मांग के अनुरूप आपूर्ति के लिए उत्पादन करता है तो वहीं मौजूदा नव उदारवादी आर्थिक नीतियां इसे पूरी तरह से अपने मुनाफे के मुताबिक बदल डालती हैं। इस नये कारपोरेट विकास के दौर में कारपोरेट अपने अधिकतम मुनाफे के अनुसार पहले उत्पाद तैयार करते हैं और उसके बाद उसकी जरूरत के मुताबिक समाज में मांग का निर्माण करते हैं। जाहिर है यह उत्पाद समाज की जरूरतों को पूरा नही करते हैं और इसमें अधिकतर उत्पाद वित्तीय उत्पाद ही होते हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय और प्राकृतिक संसाधनों का मनमाना दोहन भी इस उदारवादी विकास एक अनिवार्य जरूरत है। यह आवारा पूँजी के मुनाफे की भूख ही है जो दुनिया के तमाम प्राकृतिक और राष्ट्रीय संसाधनों का दोहन उनकी लूट की तरह करती है और इसके लिए स्वाभाविक तौर उसे सत्ताओं को हड़पने की आवश्यकता रहती है। अपने निर्मित उत्पादों की मांग तैयार करने और संसाधनों के दोहन के लिए सत्ता पर काबिज होने के लिए यह वित्त पूँजी दुनिया के तमाम हिस्सों में ऐसे नायकों को तैयार करती है जो वास्तविक सवालों से इतर भावनात्मक गैर जरूरी सवालों पर राजनीति को केन्द्रित कर सके। कारपोरेट लूट के वाहक बन सकें। मौजूदा नवउदारवादी विकास के इस दौर में पूरी दुनिया में इन उन्मादी खलनायकों की बहार है। अमेरिका के ट्रंप से लेकर भारत में नरेन्द्र मोदी तक यह बदजुबानी उनकी आवारा वित्त की जरूरतों के मुताबिक ही व्यवहार करती है। यह कारपोरेट लूट के नये नायक कभी यह नही बताना चाहते हैं कि उनकी आर्थिक नीतियों के जन्मस्थान क्या है और यह विकास की किस अवधारण पर टिके हैं। वह सड़कछाप जुमलेबाजी कर सकते हैं, विवादास्पद बयान दे सकते हैं और मीड़िया पर कारपोरेट नियंत्रण के द्वारा इन बेतुके सवालों को लगातार हमारे सामाजिक विमर्श के केन्द्र में बनाये रख सकते हैं। इस उन्माद की राजनीति का प्रत्यक्ष लक्ष्य तथाकथित नव उदारवादी विकास का शिकार समाज को बांटना है। हम इसे ट्रंप और मोदी दोनों की भाषा में पढ़ सकते हैं। मौजूदा गुजरात चुनावों में मोदी विकास का अपना तथाकथित एजेंडा भूलकर अपने असली रंग में वापस चले आये। यदि वह विकास के एजेंड़े पर रहते तो उन्हें भाजपा के 22 साल के विकास का हिसाब देना पड़ता जिसमें वह शर्तिया मात खा जाते। इसीलिए मोदी अपने सांप्रदायिक रंग में निकल आये। पाकिस्तान के राजनयिक से पूर्व प्रधानमंत्री और देश के शीर्ष नेताओं के व्यक्तिगत डिनर आयोजन को भी उन्होंने इसीलिए पाकिस्तान से जोड़ा क्योंकि वह जानते थे कि इसके आधार पर वह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज कर सकते हैं। अन्यथा पाकिस्तानी पूर्व प्रधानमंत्री से उनकी मोहब्बत और जुगलबंदी पूरे देश ने देखी है। इसके अलावा गुजरात गौरव का उनका गीत भी उनकी इसी रणनीति का ही एक हिस्सा था। वह 2002 के सांप्रदायिक दंगे के एक प्रतीक की तरह हैं जिसे आज इस संकट के समय याद दिलाकर वह भुनाना चाहते हैं। ठीक यही हाल अमेरिका में ट्रंप का भी है जो आज श्वेत नस्लवाद का चेहरा बने हुए हैं और उनके तमाम जुमले उसे नस्लवाद को हवा देने के लिए गढ़े जाते हैं। वास्तव में इस प्रकार के उन्माद की राजनीति करने वाले नायक अपनी जुमलेबाजी से जनता का ध्यान उनके असली मुद्दों और संघर्षो से हटाने का काम करते हैं। और दुनिया भर में मुनाफे की लूट के लिए भटकती आवारा वित्त पूँजी इस वास्तविकता को अच्छी तरह से जानती है और इसीलिए इस उन्मादी राजनीति को बढ़ावा देकर अपना हित साधती है।

परन्तु यह बयानबाजी जिस तरह जनवादी संस्थानों को चुनौती देती है वह लोकतंत्र के लिए एक खतरे ही आहट की तरह है! सत्ता के सर पर सवार इस बयानबाजी को ना बिना दाँतों  का शेर चुनाव आयोग डरा पाता  है, ना इसे न्यायपालिका का खौफ है और ना ही अन्य जनवादी संस्थानों का इस बयानबाजी को भय है! बल्कि जनवादी संस्थानों को चुनौती देने का यह बेख़ौफ़ अंदाज़ ही इन बयानबाजों को नफरत और उकसावे की राजनीति  का महानायक बनाता है! दरअसल, यह नफरत की राजनीति की खास मनोदशा ही है जो अपने लिए बेखौफ सूरमा नायको की मांग करती है जो निरंकुश हों निडर हों और इसी मनोदशा का पोषण करते हुए वित्त पूँजी के स्वामी और प्रबंधक ऐसे अराजक और जुमलेबाज नेता गढ़ते है! इनके समर्थको की यही मांग इन्हे शेर और बब्बर शेर जैसे तमगे  लगाने की प्रेरणा देती है! परन्तु यह जुमलेबाजी लोकतंत्र  के आधार सभी स्तंभों को ध्वस्त करने की शर्त पर ही आगे बढ़ती है! हालाँकि लोकतंत्र को कमजोर करना आवारा वित्त पूँजी की स्वाभाविक जरूरत होती है! लोकतंत्र और लोकतान्त्रिक संस्थान आवारा वित्त पूँजी की आवारगी और मनमानेपन और निरंकुशता को नियंत्रित करते हैं और नागरिको के हितो को केंद्र में रखकर आगे बढ़ते हैं! यही लोकतंत्र और आवारा वित्त पूँजी के बीच टकराव का प्रमुख बिंदु है और टकराव का कारण भी! ऐसा नहीं है कि  केवल घोषित दक्षिणपंथी राजनीति  ही इस टकराव में लोकतंत्र विरोधी होती है बल्कि आवारा वित्त पूँजी की नीतियों को अपनाने वाली तथाकथित धर्मनिरपेक्ष और जनवादी राजनीति भी अक्सर वित्त पूँजी के हितों  के अनुसार इस प्रकार के दक्षिणपंथी रूझान दिखाती है! भारत में पहली यूपीए सरकार बनने के बाद उस सरकार के वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने 2005 में न्यूयार्क में एक सेमिनार में बोलते हुए कहा था कि बेशक हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र है परन्तु यही लोकतंत्र हमारे विकास की रूकावट भी है! वित्त पूँजी के पैरोकारों को तब और लोकतंत्र विरोधी हवा मिल जाती है जब वे विकास का हवाला देते हुए चीन का जिक्र करते है! बहरहाल भारतीय राजनीति जिस नई दिशा में आगे बढ़ रही वह ना तो लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए ठीक है और ना ही देश के समावेशी विकास के लिए! यदि हम अभी भी समय रहते नहीं चेते तो वित्त पूँजी की मुनाफे की हवश और दक्षिणपंथी राजनीति  का पागलपन देश और दुनिया को उससे भी बड़े खतरे की और ले जायेगा जहां एक समय हिटलर और मुसोलिनी इस दुनिया को लेकर पहुंच गए थे!