गुजरात चुनाव का पहले चरण का मतदान, आकड़े किसके पक्ष में?

आम तौर पर, राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव के लिए बहुत अधिक  मतदान का संकेत मिलता है। हालांकि, मतदान के पहले चरण में, गुजरात में 68 प्रतिशत मतदान हुआ, जो 2012 के आम चुनाव में राज्य विधानसभा के लिए कुल मतदाताओं की तुलना में चार प्रतिशत कम है। पहले चरण में अपेक्षाकृत कम मतदान प्रतिशत, पारंपरिक तरीके से, राज्य चुनाव में भाजपा के लिए लाभ के रूप में देखा जा सकता है।
परंतु एक स्थितिपरक विश्लेषण से संकेत मिलता है कि वास्तव में कम मतदान में एक अन्तर्निहित संकेत है कि कांग्रेस ने पहले चरण में अच्छा प्रदर्शन किया है। भौगोलिक दृष्टि से पहले चरण के मतदान केंद्रों में कच्छ, सौराष्ट्र (अमरेली, भावनगर, बोताड, द्वारका, गिर सोमनाथ, जामनगर, जूनागढ़, मोरबी, पोरबंदर, राजकोट और सुरेंद्रनगर) और दक्षिण गुजरात (सूरत, भरूच, नवसारी, डांग, वलसाड, नर्मदा और तापी) के क्षेत्र शामिल थे।
कांग्रेस को मिलने वाले लाभ के बिंदू
पटेल फैक्टर– पटेल सौराष्ट्र में काफी बड़ा समुदाय हैं जबकि मुस्लिम-पटेल संयोजन कच्छ में महत्वपूर्ण है। 2015 में पाटीदार अनामत आंदोलन को देखते हुए और पीएएएस नेता हार्दिक पटेल की अगुवाई में आरक्षण के लिए लगातार जारी विरोध, सत्तारूढ़ भाजपा के लिए अच्छा संकेत देने वाला नहीं है। यहां तक कि 2015 में हुए स्थानीय चुनावों में, भाजपा सौराष्ट्र में 11 में से एक ही जिला पंचायत जीत सकती थी क्योंकि वहां आरक्षण की मांग के कारण भाजपा के खिलाफ असंतोष बहुत ज्यादा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आक्रामक अभियान के बावजूद, हार्दिक पटेल के प्रभाव में युवा पटेल कांग्रेस का चुनाव प्रचार कर रहे हैं। जबकि पटेल समाज के पुराने लोग भाजपा के साथ हैं। लेकिन तथ्य यह है कि राज्य विधानसभा में भारी संख्या में भाजपा को वोट देने वाले पटेल अब भाजपा के साथ नहीं हैं। असंतुष्ट पटेल युवाओं द्वारा  भाजपा के खिलाफ वोट देने की संभावना है, जबकि छोटे व्यवसाय वाले वोटिंग को लेकर पहले जैसे उत्साहित नही हैं, केंद्र सरकार की जीएसटी को लेकर छोटे व्यवसाय वाले काफी नाराज हैं. जो भाजपा के लिए खतरे की घंटी हैं। जाहिर है, सौराष्ट्र क्षेत्र में भाजपा जीत से पराजय की ओर बढ़ सकती है। कच्छ में, मुस्लिम-पटेल संयोजन सिर्फ भाजपा उम्मीदवारों के खिलाफ  काम करेगा।
जनजातीय फैक्टर– दक्षिण गुजरात जिले में जनजातीय लोगों की प्रमुख उपस्थिति है। छोटुभाई वसावा की भिलिस्थान टाइगर सेना (बीटीएस) और इसके राजनीतिक संस्करण भारतीय जनजातीय पार्टी (बीटीपी) पिछले दो दशकों से आदिवासी क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। वहीं अबकी बार बीटीपी और कांग्रेस गठबंधन में लड़ रहे हैं, जो स्पष्ट रूप से कांग्रेस के लिए एक फायदा होगा। किस हद तक, राज्य की आदिवासी आबादी को नोटबंदी और जीएसटी से मारा गया है और इन इलाकों में आदिवासी अधिकारों पर भी नई राजनीतिक चेतना का विस्तार हुआ है। यह नया आदिवासी फैक्टर चुनाव नतीजों में अहम भूमिका निभा सकता है। छोटूभाई वसावा की लोकप्रियता और बीटीएस द्वारा किए गए कार्यों को देखते हुए, आदिवासी वोट भाजपा के खिलाफ जाते दिखते हैं। आदिवासी युवाओं में पुरानी पीढ़ी की तुलना में विकास को लेकर अधिक जागरूकता और चाहत है और वे सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ वोट कर सकते हैं। पुरानी पीढ़ी भी परंपरागत रूप से छोटुभाई वसावा को समर्थन दे रही है।
ओबीसी फैक्टर– गुजरात के राजनीतिक इतिहास में पहली बार, ओबीसी फैक्टर राज्य चुनाव में प्रमुखता से उभरकर सामने आया है। यहां तक कि राज्य स्तर पर नई ओबीसी पार्टियों के गठन ने आकार ले लिया है। कोली समुदाय, जो कि गुजरात की आबादी में लगभग 30 प्रतिशत से अधिक है, उसने अपना स्वयं की पहल शुरू की है, जैसे कि भावनगर में स्थित व्यवस्था परिवर्तन पार्टी। यह नई पार्टी भाजपा को भारी नुकसान पहुंचा सकती है क्योंकि कोली समुदाय पहले बीजेपी के साथ था। कांग्रेस ने ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर को टिकट दे कर ओबीसी समाज को अपने तरफ मोड़ने का काम किया हैं, ये फैक्टर पहले चरण के चुनाव में कांग्रेस को मदद करेंगे।
दलित फैक्टर– ऊना घटना, दलित के खिलाफ अत्याचारों के बढ़ते मामलों और जिग्नेश मेवानी के उभरने से कांग्रेस को सत्तारूढ़ भाजपा की तुलना में बल मिला है। इन मुद्दों पर दलितों को भाजपा से कांग्रेस में वापस आने की उम्मीद है।
ग्रामीण समस्या- गुजरात में कृषि क्षेत्र में ट्रैक्टर और उर्वरक सहित कृषि उपकरणों की बढ़ती कीमतों, कृषि उत्पाद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में कमी, और अपर्याप्त सिंचाई सुविधाओं के दबाव में किसानों की बुरी हालत, कपास किसानों की बढ़ती नाराजगी और कपास के कीमतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि कपास के न्यूनतम समर्थन मूल्य में कमी आ रही है।
विकास माॅडल को लेकर सत्ता विरोध भी गुजरात चुनावों में एक नये कारक के रूप में उभरकर सामने आ रहा है। राज्य और केंद्र में भाजपा सरकार के होने से एक स्वाभाविक  सत्ता विरोधी लहर भी गुजरात चुनावों में भाजपा के खिलाफ मजबूती से उभर रही है। राज्य में बढ़ती बेरोजगारी के कारण युवा बहुत असंतुष्ट हैं और इससे चुनाव में राज्य सरकार के खिलाफ असंतोष बहुत ज्यादा फैला रहा है।
उपर्युक्त कारकों को ध्यान में रखते हुए, 2012 के विधानसभा चुनाव की तुलना में 2017 में कम मतदान भी सत्तारूढ़ भाजपा को फायदा देने की बजाए ज्यादा नुकसान करता हुआ दिखाई पड़ रहा है। वास्तव में कम मतदान प्रतिशत से कांग्रेस को फायदा हो सकता है।
स्रोत- The Critical Mirror